सम्मान या राहत

आज कल कही भी जाओ चाहे वह शहर के भीतर हो या बाहर किसी राज्य तथा राष्ट्रीय मार्ग पर, एक बड़ा साइनबोर्ड अक्सर नज़र आ जाता है। आप ने भी देखा और पढ़ा होगा, महिलाओं को मिला सम्मान। इस लेख के साथ आत्मसम्मान से भरा एक हंसता चेहरा भी नज़र आता है। उसे देख कर में स्वतः ही मुसकुराने लगती हूँ और कुछ सोचने लगती हूँ। फिर अचानक कुछ मित्रों के सलाह याद आती है कि हर बात में महिला अधिकार की बात को न देखा करो। मेरे मित्रों के सलाह मैं ज़्यादा समय तक न मान सकी।

यहाँ महिलाओं के सम्मान का प्रसंग एक सरकारी योजना से है। इस योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारो को एलपीजी कनेक्शन दिया जा रहा है। यह सुविधा तीन साल की अवधि में पांच करोड़ ऐसे परिवारों तक पहुंचाना है। इस योजना के अनुसार इसका सीधा असर महिलाओं के जीवन पर होगा। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली करोड़ो महिलाओं को रसोई के लिए पदूषित ईंधन का प्रयोग करने से मुक्ति मिलेगी। प्रदूषित ईंधन के उपयोग से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियो से वे निजात पा सकेगी। अगर इन बातों को ध्यान में रखा जाये तो “स्वच्छ ईंधन – बेहतर जीवन” जैसा मूल मंत्र का सीधा तात्पर्य इस योजना से होना दिखाई पड़ता है।

फिर मेरी चिंता का विषय क्या है? वास्तव में इस योजना का जो मूल मंत्र कहा जा रहा है वह है “महिलाओं को मिला सम्मान, स्वच्छ ईंधन -बेहतर जीवन”। इस मूलमंत्र का झलक हमें जगह-जगह उस मुस्कुराती चहरे के साथ स्पष्ट दिखाई पड़ता है। मेरा असहजता केवल एक शब्द से है – “सम्मान”। मैं यह समझने में असमर्थ हूँ की आखिर एलपीजी कनेक्शन आ जाना और महिलाओं का सम्मान के बीच क्या अंतर-सम्बन्ध हो सकता है। इस योजना के बारें में जानने की थोड़ी कोशिश की, तो पता चला महिलाओं का सशक्तिकरण सुनिश्चित करते हुए यह कनेक्शन महिलाओं के नाम पर उपलब्ध कराया जायेगा । जहाँ मैं सम्मान की बात समझ नहीं पा रही थी, वहाँ अब सशक्तिकरण की बात ने मेरी उलझन बढ़ा दी।

घर में एलपीजी कनेक्शन आने से महिलाओं को शारीरिक मेहनत से कुछ राहत ज़रूर मिलेगी। उस समय का बचत भी हो पायेगा जो वह ईंधन के साधन जुटाने में लगाती थी। साथ ही स्वस्थ्य से जुड़े गंभीर बीमारियों में कमी हो सकती है। कुल मिला कर एलपीजी कनेक्शन के कारण महिलाओं की तात्कालिक परिस्थिति अथवा अवस्था में कुछ सुधर हो सकता है। जैसेकि घर के अंदर पानी का उपलब्ध होने से, एलपीजी, माइक्रोवेव, इंडक्शन चूल्हा आदि का उपयोग से, वाशिंग मशीन, मिक्सर ग्राइन्डर जैसे उपकरणों से महिलाओ को शारीरिक परिश्रम से अनेक राहत मिली है। गौर करने वाली बात है की इन सब से केवल महिलाओं राहत मिलने की बात क्यों होती है? मेरा यह सवाल बहुतो को अटपटा लग सकता है।

सीधी सी बात है। बदलते समय के साथ लकड़ी, कोयला, केरोसिन के बदले घरों में एलपीजी तथा अन्य आधुनिक चूल्हा आ चुका है। जो नहीं बदला वह है महिलाओं की भूमिका। घरेलु काम आज भी महिलाओं का मुख्य ज़िम्मेदारी है। कारण बढ़ती आर्थिक मांग हो या फिर स्वयं का निर्णय, अगर महिला आय जनित कार्य से जुडी है तब भी घर की ज़िम्मेदारी उसकी है। क्यों की पुरुष आम तौर पर आय उपार्जन कार्य से जुड़ा है, घर सँभालने जैसे कार्य में उसका योगदान बहुत काम होता है। यह तर्क एक प्रचलित व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। सामाजिक व्यवस्था बदलने लगी है। आज महिलाएं घर की आर्थिक ज़रूरतों को जुटाने में बड़ी मात्रा में सहभागी है। इसके विपरीत घर सँभालने में पुरुष बराबर का भागीदार नहीं है। ऐसे में वह तर्क बेबुनियाद है।

असल में बात जेंडर आधारित कार्य व्यवस्था की है। जिसके चलते महिला एवं पुरुषों के लिए कुछ काम तय कर दिया जाता है और कुछ कामों पर पाबन्दी लगा दी जाती है। इस विभाजन का सबसे नुक्सान देय पहेलु है इसका गैर-बराबर होना। यह इंसानी क्षमताओं का सम्पूर्ण रूप से विकसित होने से रोकता है। इससे महिलाओं को दोयम दर्ज़ा एवं पुरुषों को आगे बढ़ने का बेहतर अवसर प्राप्त हुआ।
महिलाओं की दैनिक परिस्थिति में सुधार होना एवं उनकी स्थिति में बदलाव आना दो अलग बात है। इस फर्क को समझना होगा। अक्सर इन दोनों बातों को एक दूसरे के पर्याय के रूप में व्यवहारित किया जाता है।

अधिकार एवं सशक्तिकरण के सन्दर्भ में दो प्रकार के ज़रूरतों को चिन्हित किया गया है। एक है व्यावहारिक ज़रूरतें, जो महिला एवं पुरुषों के दैनिक जीवन के तात्कालिक ज़रूरोतों से जुड़ा है। इन जरूरतों की पूर्ति से, जेंडर आधारित प्रचलित भूमिकाओं को सहजता और कुशलता के साथ निभाने के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। उपलब्ध सुविधाओं तक पहुंच बढ़ता है। इस तरह के परिवर्तन को आसानी से देखा, समझा और महसूस किया जा सकता है।
दूसरी तरह की ज़रूरतें सामाजिक व्यवस्था के अंदर महिला एवं पुरुषों की स्थिति से सम्बंधित है। जिसे हम स्ट्रैटेजिक ज़रुरत कहते है। निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी, संसाधन पर नियंत्रण, जीवन में आगे बढ़ने के अवसर, चुनाव करने की स्वच्छंदता, आर्थिक स्वतंत्रता जैसे बुनियादी जरूरते शामिल है। सबसे महत्वपूर्ण बात है की यह गैर बराबरी सोच एवं व्यवस्था को चुनोती देता है तथा परिवर्तन की तरफ ले जाता है। परिवार तथा समाज में महिलाओं का बराबर दर्ज़ा सुनिश्चित करने का असीम संभावना इसमें निहित है। लेकिन इन विषयों पर खुलकर बात और काम कम होती है। क्या यह कोई अनकहा डर है?

महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन लाये बिना, उन्हें समाज तथा परिवार में दोयम दर्जा देते हुए कोई दावा कैसे कर सकता है कि महिलाओं को मिला सम्मान। जिस तरह के परिस्थितियो में महिलाएं विशेषकर गरीब एवं वंचित महिलाएं है, उनमें तुरंत सुधार होना अति आवश्यक है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन परिस्थितियों में सुधार लाने की उद्देश्य से उठाई गयी पहलों को महिलाओं का सम्मान से जोड़ना सिर्फ अनुचित ही नही उनके खिलाफ एक और अन्याय होगा। कल्पना कीजिये एक परिवार जहाँ एलपीजी कनेक्शन, घर में नल का पानी आदि जैसे सुविधा होते हुए भी उस घर की लड़किया एवं महिलाएं शिक्षा से वंचित है, उनका विवाह एवं प्रजनन उम्र से पहले हो रहा है, आने जाने पर पावंदी है, घरेलु हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह सम्मान तो कदापि नहीं हो सकता। सोचने वाली बात तो यह भी है की हर इंसान की तरह महिलाओं के जरूरते एवं उनकी प्राथमिकता भी एक दूसरे से अलग होती है। फिर भी कौन सी जरूरत कब पूरा करना है यह कोई और तय कर रहा है।

अगर इससे महिलाओं को केवल राहत मिली है तो वही कहा जाये। अगर उनके जीने की परिस्थितियों में सुधर हुआ है तो वही दिखाया जाये। आखिर जो जैसा है उसे वैसा प्रस्तुत करने में हर्ज क्या है? रही बात महिलाओं की स्थिति में सुधार की और उनकी सम्मान की – यह उन्हें तय करने दीजिये।

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